मंगलवार, 22 सितंबर 2009

ब्रज का प्राचीन गौरव

यमुना नदी की पावन धारा के तट का यह भू-भाग, जिसे आजकल ब्रजमंडल या मथुरामंडल कहते हैं और जो पहिले मध्य देश अथवा ब्रम्हर्षि देश के अन्तर्गत शूरसेन जनपद के नाम से प्रसिद्ध था, भारतवर्ष का अत्यन्त प्राचीन और महत्वपूर्ण प्रदेश माना गया है, अत्यन्त प्राचीन काल से ही इसी गौरव-गाथा के सूत्र मिलते हैं। हिन्दू, जैन, और बौद्धों की धार्मिक अनुश्रुतियों तथा संस्कृत, पालि, प्रकृत के प्राचीन ग्रन्थों में इस पवित्र भू-खण्ड का विशद वर्णन वर्णित है।

हिन्दू उल्लेख और अनुश्रुतियाँ

संसार के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ॠगवेद में यमुना तट की इस मनोरम भूमि और इस पर विचरण करने वाली लम्बे सीगों से सम्पन्न सुन्दर गायों के उल्लेख के साथ ही साथ, कटिपथ भाष्यकारों के मतानुसार, कुछ ब्रज लीलाओं का भी संकेत मिलता है। १ अथर्ववेद शतपथ ब्रहम्मण, रामायण, महाभारत और हरिवंश पुराण आदि में इस भू-भाग का विविध प्रकार से वर्णन प्रस्तुत किया गया है। २

आर्य ग्रन्थों के अनुसार मानवजाति के आदि पिता स्वायम्भुव मनु थे, जो मनुओं की परम्परा में प्रथम माने जाते है। उनके समय में यमुना तट का यह प्रदेश विशाल सधन वनों से अच्छादित था। कालान्तर में यह बन्य प्रदेश ॠषि-मुनियों की तपो-भूमि के रुप में परिणित हो गया, जहां अनेक सिद्ध रुप यमुना के तट के आश्रमों में तपस्या करते हुए ब्रम्ह का चिन्तन मनन करते थे। उस बन को 'मधुबन' कहा गया है। वेदों में ब्रम्हविद्या अथवा अत्मविद्या की संज्ञा 'मधुविद्या' है। कदाचित इसीलिये उस सिद्ध बन को 'मधुबन' का नाम प्राप्त हुआ था।

मधुबन के महत्व की प्राचीनतम स्वीकृति उस पौराणिक उल्लेख में है, जिस में कहा गया हैं कि स्वायंभुव मनु के पुत्र ध्रुव ने नारद मुनि के उपदेश से उसी बन में तपस्या की थी। नारद जी ने ध्रूव को वतलाया था कि मधुबन की पुण्य भूमि को भगवान श्री हरि: का नित्य सानिध्य प्राप्त है। ३ अतः यहां पर तप आराधना करने से इच्छित फल की सीध्र उपलब्धि होती है। राजा अंबरीष को भी विष्णु के चक्र के द्वारा इसी भूमि पर अभय प्रदान करने की अनुश्रति प्रलित है। पौराणिक जगत् के उन प्राचीन भक्तों की स्मृति रक्षार्थ ब्रज के वर्तमान मधुबन ग्राम में ध्रुव आश्रम और ध्रुव गुफा तथा मथुरा नगर में ध्रुव टीला, अंबरीष टीला, और चक्र तीर्थ जैसे पुण्य स्थल विधमान हैं, जो ब्रज की प्राचीनता और पवित्रता के साक्षी हैं।

मथुरा गोवर्धन मार्ग पर शांतनुकुण्ड नामक एक प्राचीन सरोवर है, जो पौख वंश के प्रतापी महाराज शांतनु का स्मृति स्थल माना जाता है। शांतनु के पुत्र भीष्म थे, जो श्री कृष्ण के सम्बधी और कृपापात्र पाण्डवों के पितामह थे। शांतनु ने अपनी बृद्धावस्था में एक केवट कन्या सत्यवती से विवाह किया था। शांतनु कुंड के समीप का सतोहा ग्राम उक्त सत्यवती के नाम पर ही प्रसिद्ध हुआ कहा जाता है।

मथुरा में यमुना नदी के जो प्राचीन धाट हैं, उनमें सोम (वर्तमान गोधाट) वैकुंठ धाट, और कृष्ण गंगा नामक धाट उल्लेखनीय हैं। वाराह पुराण में कृष्ण गंगा धाट की स्थिति सोमधाट और वैकुंठ धाट के मध्य में वर्णित की गयी है, और उसे महार्षि व्यास का तपस्थल कहा गया है। ४ उक्त स्थल पर किसी काम में कृष्ण गंगा नामक एक नदी यमुना में मिलती थी। व्यास जी का नाम द्वेैपाथन कृष्ण था। उनके नाम पर कृष्ण गंगा और यमुना के संगम का वह धाट कृष्ण गंगा धाट कहा जाने लगा था। ब्रज में यह अनुश्रुति प्रसिद्ध है कि व्यास जी ने इसी स्थल पर पुराणों की रचना की थी। वर्तमान काल में कृष्ण गंगा नदी तो नहीं है, किन्तु इस नाम का धाट अब भी विधमान है।

प्रागैतिहासिक कालिन मधुबन के विशिष्ट भाग में यमुना नदी के तट पर एक सुन्दर नगरी का निर्माण किया गया। वह नगरी पहिले मधुपुरी अथवा मधुरा और बाद में मथुरा के नाम से विख्यात हुई। उसके एक ओर यमुना पुलिन और उसके तट की सधन कूंजों का मनोरम दृष्य था तथा तीन ओर बन-उपबन, लता और गुल्मों का प्राकृतिक वैभव था। उसके पश्चिम में कुछ दूर गोवर्धन पहाड़ी का नैसंगिक सौन्दर्य था। इस प्रकार यमुना नदी और गोवर्धन पहाड़ी से परिवेष्ठत वह रमणीक पुरी 'मथुरा' के नाम से लोक में प्रसिद्ध हुई। ५ इसके निर्माण और विकास के लिये मधु और उसके पुत्र लवण, रामानुज, शत्रुधन और उसके पुत्र सवाहु-शूरसेन तथा सत्वत से लेकर उग्रसेन और उनके पुत्र कंस तक क्रमशः दैत्यवंशी, सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी कई राजा-महाराजाओं के नाम पुराणों में प्रसिद्ध सहित वर्णित हैं।


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१. वेदों में ब्रज लीला, (पोददार अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ. ६४५)

२. पोददार अभिनन्दन ग्रन्थ, पृ. ६४१, ८४७

३. पुण्यं मधुवनं यत्र साधिहयं नित्यदा हरे:। (भागवत, ४-८)

४. सोमवैकुंठयोर्मध्ये कृष्ण गंगोति कथ्थते।

तत्रा तत्यन्तपो वयासो मथुरायां स्थितोऽमलः।। (वाराह)

५. गोवर्धनो गिरिवरो यमना च महानदी।

तयोर्मध्यो पुरी रम्या मथुरा लोक विक्षुता।।, वराह पुराण

पौराणिक और अनुश्रुतियों के आधार पर ब्रज का विस्तार


जिन पुराणों में ब्रज के महत्व के साथ इसके विस्तार का भी वर्णन हुआ है, उनमें बाराह पुराण सर्वाधिक प्रसिद्ध है। इसमें मथुरा मण्डल का विविध रुप से इतना अधिक उल्लेख किया गाया है कि बाराह पुराण को यदि ब्रजमंडल से सम्बधित पुराण ही कहा जाय तो को अयुक्त कथन न होगा। उसी पुराण का एक अंश मथुरा महात्म्य के नाम से प्रसिद्ध है।
वराह पुराण में मथुरा मंडल का विस्तार २० योजन वतलाया गया है और कई प्रसंगों पर इसकी विक्षप्ति करते हुए कई प्रकार से इसके महत्व का वर्णन किया गया है। १ वायुपुराण में मथुरामंडल का विस्तार ४० योजन वर्णित किया गया है। २ किन्तु उसका कथन बाराह पुराण के उल्लेख के समान मान्यता और प्रसिद्धि नहीं प्राप्त कर सका है। एक योजन साधारणतया ४ कोस अथवा � ७ मील का होता है, इस लिये मोटे तौर पर ब्रजमंडल का विस्तार ८४ कोस का समझा जाने लगा।
चौरासी कोस के इस ब्रजमंडल का आकार कहाँ से कहाँ तक है, इसे वतलाने के लिये ब्रज में कई अनुश्रुतियाँ प्रचालित हैं। ऐसी ही एक दोहाबद्ध अनुश्रुति ब्रज के सुप्रसिद्ध शोधकर्ता श्री एफ. एस. ग्राउज ने इलियट की गलौसरी से उद्धृत � की है, जिसका पाठ उन्होंने इस प्रकार दिया है-
इत वरहद इत सोनहद, उत सूरसेन के गांव।
ब्रज चौरासी कोस में, मथुरामंडल मांह।। ३
उक्त दोहा में आये स्थलों स्थलों की पहिंचान के लिए श्री ग्राउज ने ब्रज की सीमाओं पर स्थित बनों का नामोल्लेख करने वाले एक एक श्लोक को भी उद्धृत किया है, जिसका पाठ उन्होंने इस प्रकार अंकित किया है-
पूर्व हास्यवनं नीय पश्चिमस्यापहाकिंरक।
दक्षिणे जन्हु संज्ञाकं भुवनाख्यं तथोत्तरे।।
ग्राउज महोदय ने पंडितों से उक्त श्लोक में आये हुए बनों के नामों का मिलान पूर्वोक्त हिन्दी दोहा के नामों से करने को कहा, तो उन्होंने वतलाया-पूर्व का हास्य बन ही बरहद बरहद है, जो अलीगढ़ जिले में है। पश्चिम का उपहार बन गुड़गांवा जिले का सोनहद है, दक्षिण का जन्हु बन सूरसेंन का गाँव अर्थात बटेश्वर है और उत्तर का भुवन बन शेरगढ़ के निकट का भूषण बन है। ४
ग्राउज महोदय का स्पष्ट कथन है कि वे पूर्वोक्त दोहा को किसी ऐतिहासिक शोध का सूचक नहीं मानते हैं। ५ और उक्त श्लोक में आये हुए बनों की पहिचान को कल्पना से अधिक महत्व नहीं देते है; इसीलिये उनकी अधिक छान बीन करने की अवश्यकता भी उन्होंने नहीं समझी है। ६ फिर भी ब्रज के विस्तार और इसकी सीमा के सम्बन्ध में लिखने वाले कई विद्वानों ने ग्राउज के कथन को महत्वपूर्ण मानकर प्रमाण रुप में उद्धृत किया है। ७
ब्रज विस्तार से सम्वधित दोहा गर्गसंहिता में थी निम्न प्रकार से वर्णित है-
प्रागुदीव्यां वर्हिषदो दक्षिणास्यां यदो: पुरात।
पश्चिमायां शोणापुरान्माथुरंमंडलं विदु:।।
विशंधोजन विस्तीर्ण सार्द्धयधोजने नवै।
माथुरंमंडलं दिव्यं व्रज माहुर्मनीषिण।। ८
नन्दराय जी के पूछने पर सन्नंद जी ने ब्रज का परिचय देते हुए कहा था- ''जिसके पूर्व-उत्तर में वर्हिषद (बरहद) है, दक्षिण में यदुपुर (सूरसेन ग्राम) है, पश्चिम में शोणपुर (सोनहद) है, उस २० योजन विस्तृत दिव्य माथुर मंडल को मनीषी 'ब्रज' कहते हैं।''
ब्रज सीमा के सम्वध में श्री नारायण भटटकृत ब्रज भक्ति विलास में भी वर्णित है, जिसका संस्करण गौड़ीय विद्वान बावा कृष्णदास ने प्रकाशित किया है। उसमें श्लोक पाठ इस प्रकार है-
पूर्व हास्यवनं नाम पश्चिमस्पात्पहारिकम्।
दक्षिणे जन्हुसंज्ञकं सोनहदाख्यं तथोत्तरे।। ९
अनुश्रुति के दोहा में जहां तीन ओर की हद का विवरण प्रस्तुत किया है, वहाँ गर्ग सहिंता के उद्धरण में वर्हिषद (बरहद) को पूर्व-उत्तर में स्थित वतलाकर चारों दिशाओं की सीमा देने की चेष्टा की गयी है। इसी प्रकार ब्रज भक्ति विलास के उद्धहरण विषयक दोनों पाठों में भी थोड़ा सा अन्तर है। बाबा कृष्णदास के पाठ में उत्तरी सीमा के बन का नाम सोनहद बतलाया गया है, जवकि ग्राउज के पाठ में इसका नाम भुवन बन है। ग्राउज ने पश्चिम के अपहारि बन या उपहार बन की पहिचान करते हुए उसे गुड़गाँव जिले का सोन वतलाया है। उन्होने वर्णित किया है कि गड़गांवा में गंधक के गर्म सोतों के लिये प्रसिद्ध है। १० डा. दीन दयाल गुप्त ने सोन को गुड़गाँवा जिले की छोटी वरसाती नदी वतलाया है। ११
सोनहद गुड़गाँवा जिले में होडल के निकट एक छोटा ग्राम है। सम्भव है वहां कोई वरसाती नदी भी हो, किन्तु उसे व्रज की पश्चिमी सीमा के उपहार बन में मानना ग्राउज का भ्रमात्मक कथन है। गुड़गाँवा और सोनहद मथुरामंडल के प्राय उत्तर में है। न कि पश्चिम में। ब्रज की उत्तरी सीमा को बन को ब्रज भक्ति विलास में एक स्थान पर सोनहद बन और दूसरे स्थान पर सूर्यपत्तन बन अंकित किया है। सूर्यपत्तन की वर्तमान पहिचान समई खेड़ से की जा सकती है जो भरतपुर के बहज के निकट स्थित है। १२

१. विंशतिर्योजनानान्तु माथुरं मम मण्डलम।
यत्र तत्र नरः स्नातो मुच्यते सर्वकिल्विषै:।। (अध्याय १५८, श्लोक -१)
विंशतिर्योजनानान्तु माथुर मम मण्डलम।
इंद पृक्षं महाभागे सर्वेषां � मुक्तिदायि च।। � (अध्याय १६३ श्लोक -१५)
विंशतिर्योजनानांहि मांथुर मम मण्डलम।
पदे पदै अश्वमे धानां फलं नात्र विचारण।। (अध्याय १६८ श्लोक -१०)
२. चत्वारिश योजनानां ततस्तु मथुरा
३. मथुरा-ए-डिस्ट्रक्ट मेमोअर (द. स.), पृ. ७८
४. मथुरा-ए-डिस्ट्रक्ट मेमोअर (द. स.), पृ. ९१
५. मथुरा-ए-डिस्ट्रक्ट मेमोअर (द. स.), पृ. ७९
६. मथुरा-ए-डिस्ट्रक्ट मेमोअर (द. स.), पृ. ९१
७. गुप्त, दीनदयाल, अष्टछाप और बल्लभ संम्प्रदाय, स. २००४ पृ. २-३
डॉ सत्येन्द्र, ब्रज लोक साहित्य का अध्ययन, स. २००५ पृ. ४५-४६
८. गर्गसंहिता, (वृन्दाबन खंड, अध्याय एक, श्लोक ११-१२)
९. श्री ब्रजभक्ति विलास (२-१६) पृ. ३४
१०. मथुरा-ए-डिस्ट्रक्ट मेमोअर (द. स.), पृ. ७९
११. अष्टछाप और बल्लभ संम्प्रदाय (प्रथम खण्ड) पृ. ४
१२. दास, कृष्ण, ब्रज मंडल दर्शन, पृ. ५१

बुधवार, 9 सितंबर 2009

ब्रज का स्वरुप एवं सीमा

ब्रज शब्द का अर्थ


ब्रज शब्द संस्कृत धातु ब्रज से बना है, जिसका अर्थ गतिशीलता से है। जहां गाय चरती हैं और विचरण करती हैं वह स्थान भी ब्रज कहा गया है। अमरकोश के लेखक ने ब्रज के तीन अर्थ प्रस्तुत किये हैं- गोष्ठ (गायों का बाड़ा) मार्ग और वृंद (झुण्ड) १ संस्कृत के वृज शब्द से ही हिन्दी का ब्रज शब्द बना है. वैदिक संहिताओं तथा रामायण, महाभारत आदि संस्कृत के प्राचीन धर्मग्रंथों में ब्रज शब्द गोशाला, गो-स्थान, गोचर भूमि के अर्थों में भी प्रयुक्त हुआ है। ॠगवेद में यह शब्द गोशाला अथवा गायों के खिरक के रुप में वर्णित है। २ यजुर्वेद में गायों के चरने के स्थान को ब्रज और गोशाला को गोष्ठ कहा गया है। ३ शुक्लयजुर्वेद में सुन्दर सींगों वाली गायों के विचरण स्थान से ब्रज का संकेत मिलता है। ४ अथर्ववेद में गोशलाओं से सम्बधित पूरा सूक्त ही प्रस्तुत है। ५ हरिवंश तथा भागवतपुराणों में यह शब्द गोप बस्त के रुप में प्रयुक्त हुआ है। ६ स्कंदपुराण में महर्षि शांण्डिल्य ने ब्रज शब्द का अर्थ व्थापित वतलाते हुए इसे व्यापक ब्रम्ह का रुप कहा है। ७ अत यह शब्द ब्रज की आध्यात्मिकता से सम्बधित है।
वेदों से लेकर पुराणों तक में ब्रज का सम्बध गायों से वर्णित किया गया है। चाहे वह गायों को बांधने का बाडा हो, चाहे गोशाला हो, चाहे गोचर भूमि हो और चाहे गोप-बस्ती हो। भागवतकार की दृष्टि में गोष्ठ, गोकुल और ब्रज समानार्थक हैं। भागवत के आधार पर सूरदास की रचनाओं मे भी ब्रज इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।
मथुरा और उसका निकटवर्ती भू-भाग प्राचीन काल से ही अपने सघन वनों, विस्तृत चारागाहों, गोष्ठों और सुन्दर गायों के लिये प्रसिद्ध रहा है। भगवान श्रीकृष्ण का जन्म यद्यपि मथुरा नगर में हुआ था, तथापि राजनैतिक कारणों से उन्हें जन्म लेते ही यमुना पार की गोप-वस्ती में भेज दिया गया था, उनकी वाल्यावस्था एक बड़े गोपालक के घर में गोप, गोपी और गो-वृंद के साथ बीती थी। उस काल में उनके पालक नंदादि गोप गण अपनी सुरक्षा और गोचर-भूमि की सुविधा के लिये अपने गोकुल के साथ मथुरा निकटवर्ती विस्तृत वन-खण्डों में घूमा करते थे। श्रीकृष्ण के कारण उन गोप-गोपियों, गायों और गोचर-भूमियों का महत्व बड़ गया था।
पौराणिक काल से लेकर वैष्णव सम्प्रदायों के आविर्भाव काल तक जैसे-जैसे कृष्णौ-पासना का विस्तार होता गया, वैसे-वैसे श्रीकृष्ण के उक्त परिकरों तथा उनके लीला स्थलों के गौरव की भी वृद्धि होती गई। इस काल में यहां गो-पालन की प्रचुरता थी, जिसके कारण व्रजखण्डों की भी प्रचुरता हो गई थी। इसलिये श्री कृष्ण के जन्म स्थान मथुरा और उनकी लीलाओं से सम्वधित मथुरा के आस-पास का समस्त प्रदेश ही ब्रज अथवा ब्रजमण्डल कहा जाने लगा था।
सूरदास तथा अन्य व्रजभाषा के भक्त कवियों और वार्ताकारों ने भागवत पुराण के अनुकरण पर मथुरा के निकटवर्ती वन्य प्रदेश की गोप-बस्ती को ब्रज कहा है और उसे सर्वत्र 'मथुरा', 'मधुपुरी' या 'मधुवन' से प्रथक वतलाया है। ९ � आजकल मथुरा नगर सहित वह भू-भाग, जो श्रीकृष्ण के जन्म और उनकी विविध लीलाओं से सम्बधित है, ब्रज कहलाता है। इस प्रकार ब्रज वर्तमान मथुरा मंडल और प्राचीन शूरसेंन प्रदेश का अपर नाम और उसका एक छोटा रुप है। इसमें मथुरा, वृन्दाबन, गोवर्धन, गोकुल, महाबन, वलदेव, नन्दगाँव, वरसाना, डीग और कामबन आदि भगवान श्रीकृष्ण के सभी लीला-स्थल सम्मिलित हैं। उक्त ब्रज की सीमा को चौरासी कोस माना गया है।
इस प्रकार ब्रज शब्द का काल-क्रमानुसार अर्थ विकास हुआ है। वेदों और रामायण-महाभारत के काल में जहाँ इसका प्रयोग 'गोष्ठ'-'गो-स्थान' जैसे लघु स्थल के लिये होता था। वहां पौराणिक काल में 'गोप-बस्ती' जैसे कुछ बड़े स्थान के लिये किया जाने लगा। उस समय तक यह शब्द प्रदेशवायी न होकर क्षेत्रवायी ही था।
भागवत मे 'ब्रज' क्षेत्रवायी अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। १० वहां इसे एक छोटे ग्राम की संज्ञा दी गई है। उसमें 'पुर' से छोटा 'ग्राम' और उससे भी छोटी बस्ती को 'ब्रज' कहा गया है। ११ १६वीं शताब्दी में 'ब्रज' प्रदेशवायी होकर 'ब्रजमंडल' हो गया और तव उसका आकार ८४ कोस का माना जाने लगा था। १२ उस समय मथुरा नगर 'ब्रज' में सम्मिलित नहीं माना जाता था। सूरदास तथा अन्य ब्रज-भाषा कवियों ने 'ब्रज' और मथुरा का पृथक् रुप में ही कथन किया है, जैसे पहिले अंकित किया जा चुका है।
कृष्ण उपासक सम्प्रदायों और ब्रजभाषा कवियों के कारण जब ब्रज संस्कृति और ब्रजभाषा का क्षेत्र विस्तृत हुआ तब ब्रज का आकार भी सुविस्तृत हो गया था। उस समय मथुरा नगर ही नहीं, बल्कि उससे दूर-दूर के भू-भाग, जो ब्रज संस्कृति और ब्रज-भाषा से प्रभावित थे, व्रज अन्तर्गत मान लिये गये थे। वर्तमान काल में मथुरा नगर सहित मथुरा जिले का अधिकांश भाग तथा राजस्थान के डीग और कामबन का कुछ भाग, जहाँ से ब्रजयात्रा गुजरती है, ब्रज कहा जाता है। ब्रज संस्कृति और ब्रज भाषा का क्षेत्र और भी विस्तृत है।
उक्त समस्त भू-भाग रे प्राचीन नाम, मधुबन, शुरसेन, मधुरा, मधुपुरी, मथुरा और मथुरामंडल थे तथा आधुनिक नाम ब्रज या ब्रजमंडल हैं। यद्यपि इनके अर्थ-बोध और आकार-प्रकार में समय-समय पर अन्तर होता रहा है। इस भू-भाग की धार्मिक, राजनैतिक, ऐतिहासिक और संस्कृतिक परंपरा अत्यन्त गौरवपूर्ण रही है।
व्रजन्ति गावो यस्मिन्निति व्रजः

१. गोष्ठाध्वनिवहा व्रजः (अमरकोश ३-३-३०)
२. गवामय व्रजं वृधि कृष्णुष्व राधो अद्रिवः (ॠक. १-१०-७)
यं त्वां जनासो अभिसचरन्ति गाव उष्णमिव व्रजं यविष्ठ (ॠक. १०-४-२)
३. व्रजंगच्छ गोष्ठान (यजु. १-२५)
४मथुरा-ए-डिस्ट्रक्ट मेमोअर (द. स.), पृ. ९१
५अथर्ववेद (२-२६-१)
६.तद व्रजस्थानमाधिकम् शु शुभे कानना वृतम्।
बृजे वसन् किम करोन् मधुपर्या च केशव (भागवत १०-१-१०)
७. वैष्णव खण्ड, भगवत महात्म्य (१-१९-२०)
८. वका विदारि चले बृज को हरि (सूरसागर पद स. १०४७)
दावानल 'ब्रज' जन पर छापौ � (सूरसागर पद स. १२१०)
'ब्रज' में बाजति आज वधाई। � (परमानन्द सागर पद स। १७)

'ब्रज' ते वन को चलत कन्हेया। (परमानन्द सागर पद स. २७४)
पाछे एक समय श्री आचार्य जी महाप्रभु आप 'ब्रज' मे पाँउ धारे। (चौरासी वैष्णव की वार्ता पृ. ६)
सो अलीखान ब्रज देखिकै बोहोत पसन्न भए। (दोसौ बावन वैष्णव की वार्ता प्रथम खण्ड, पृ. २९९)
९. आतुर रथ हांक्यौं मधुबन कों 'ब्रज' जन भऐ अनाथ (सू. सा. प. ३६११)
सूरदास प्रभु आई मधुपुरी, ऊधौ कों 'ब्रज' दियौ पठाई (सू. सा. प. ४०२९) �
१०. श्रीमद्भागवत (१०-१-८ और ९)
११. शिथूश्चकार निछनन्ती पुरग्रामव्रजादिषु (भगवत, १०-६-२)
१२. आई जुरे सव ब्रज के वासी । डेरा परे कोस चौरासी ।।१५२३।।
डेरा परे कोस चौरासी। इतने लोग जुरे ब्रजवासी ।।१५३७।।